Changing Family Structure and Disintegration in Hindi Narrative Literature : An Analytical Study

Title: Changing Family Structure and Disintegration in Hindi Narrative Literature : An Analytical Study Download

Author’s : Prashant Kumar Singh

Date of Publication (ONLINE) :-05-02-2026
DOI :-10.71037/sanvahak.v2i1.06
Online Publication Certificate No. :- SNVHK/210
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cite this article:
Singh Prashant Kumar. ”Changing Family Structure and Disintegration in Hindi Narrative Literature : An Analytical Study”, Published in Sanvahak (संवाहक), ISSN: 3108-1347(Online), Volume-2 | Issue-1, Jan.-March, 2026, Page No. :-33-40. URL : https://sanvahak.gyanvividha.com/wp-content/uploads/2026/07/Prashant-kumar-singh-Sanvahak-vol2-issue-1-Jan.-March-2026-pp-33-40.pdf

Abstract :  यह शोध पत्र हिन्दी कथा साहित्य के परिप्रेक्ष्य में भारतीय पारिवारिक संरचना में आए ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक बदलावों का गहन एवं विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय समाज की मूल इकाई, जो सदियों से सामूहिकता, सहिष्णुता, त्याग और पारस्परिक निर्भरता पर आधारित संयुक्त परिवार हुआ करती थी, आज औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, वैश्वीकरण और व्यक्तिवाद के तीव्र प्रभाव में विघटित होकर एकाकी (नाभिकीय) परिवार और यहाँ तक कि विखंडित संबंधों में तब्दील हो गई है। प्रस्तुत अध्ययन मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ से लेकर उषा प्रियंवदा की ‘वापसी’, भीष्म साहनी की ‘चीफ़ की दावत’, मन्नू भंडारी के ‘आपका बंटी’, मोहन राकेश के ‘आधे-अधूरे’, कृष्णा सोबती के ‘मित्रो मरजानी’ और अलका सरावगी के ‘कलिकथा वाया बाईपास’ जैसी युगांतरकारी रचनाओं के सूक्ष्म पाठ्यात्मक विश्लेषण के माध्यम से पारिवारिक विघटन के बहुआयामी कारणों की पड़ताल करता है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि पारिवारिक विघटन केवल भौतिक घरों का टूटना नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं का क्षरण, अर्थ (पैसे) की प्रधानता, स्त्री-विमर्श के उदय से उपजे नए संघर्ष, बाल मनोविज्ञान पर पड़ते आघात और पीढ़ियों के बीच बढ़ते वैचारिक अंतराल का त्रासद परिणाम है। निष्कर्षतः, यह पत्र स्थापित करता है कि समकालीन हिन्दी साहित्य केवल इस सामाजिक विघटन का मूक दर्शक नहीं है, बल्कि यह बदलते जीवन-मूल्यों, उपभोक्तावादी संस्कृति और खोखले होते मानवीय संबंधों का एक प्रामाणिक और निर्मम समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है।

Keywords : पारिवारिक संरचना, विघटन, पीढ़ी संघर्ष, वैश्वीकरण, बाल मनोविज्ञान, हिन्दी कथा साहित्य, महानगरीय बोध, व्यक्तिवाद, यथार्थवाद, पितृसत्ता।

Publication Details:

Journal : Sanvahak (संवाहक)

ISSN : 3108-1347 (Online)

Published In : Volume-2 | Issue-1, Jan.-March, 2026

Page Number(s) : 33-40

Publisher Name :

 Mrs Anubha Chaudhary | https://sanvahak.gyanvividha.com | E-ISSN : 3108-1347

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