Bhāratīya Jñāna Paramparā meṃ Lokanīti : Svarūpa, Ādhāra evaṃ Sāmpratik Prāsaṅgikatā

Title: Bhāratīya Jñāna Paramparā meṃ Lokanīti : Svarūpa, Ādhāra evaṃ Sāmpratik Prāsaṅgikatā Download

Authors:-Dr. Devendra Singh Rajput
Page No. :-86-91 View & Download
Date of Publication (ONLINE) :-17-04-2026

DOI ; 10.71037/sanvahak.v2i2.13

How to cite this article:
Rajput
Dr. Devendra Singh,”Bhāratīya Jñāna Paramparā meṃ Lokanīti : Svarūpa, Ādhāra evaṃ Sāmpratik Prāsaṅgikatā”, Sanvahak, Vol-2;Issue-2, April-June, 2026, Page No. :-86-91. URL : https://sanvahak.gyanvividha.com/wp-content/uploads/2026/09/Dr.-Devendra-Singh-Rajput-Snvahak-Vol-2-Issue-2-April-June-2026-pp-86-91.pdf

Abstract : भारतीय ज्ञान परंपरा अनुभव एवं बौद्धिकता के अद्भुत समन्वय के साथ मानवीय सभ्यता के उषस् काल से अविच्छिन्न रूप से सतत प्रवाहित है। यह सतत प्रवाह वेद, उपनिषद्, दर्शन, धर्मशास्त्र, महाकाव्य, पुराण, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद जैसे प्रबुद्ध साहित्य से सिंचित रहा है। इस परंपरा में ज्ञान को जीवन से अलग नहीं समझा गया बल्कि इसे मनुष्य, समाज और राज्य से जोड़कर देखा गया। यही कारण है कि शासन और समाज-व्यवस्था से जुड़े प्रश्न भी इस ज्ञान-चर्चा का भाग रहे हैं। ‘नीति’ शब्द ‘नी’ धातु से बना है, जिसका आशय है – मार्ग दिखाना या सही दिशा में ले जाना। इसलिए नीति का अर्थ है वह सिद्धांत या तरीका जो व्यक्ति, समाज या राज्य को सही मर्ग पर ले जाएं। भारतीय दृष्टि में ‘लोकनीति’ से तत्पर्य केवल आज की शासकीय नीति जैसा नहीं है, बल्कि इसमें लोगों की भलाई, न्याय, सामाजिक जिम्मेदारी और सबके कल्याण का भाव भी सम्मिलित है। आज की सार्वजनिक नीति में आमतौर पर समस्या को पहचानना, विकल्प बनाना, फैसला लेना, संसाधन बांटना, लागू करना और नतीजों को जांचना – ये सब चरण आते हैं। जब इसकी तुलना भारतीय विचारों से की जाती है तो ‘लोकसंग्रह’, ‘प्रजासुख’, ‘धर्म’, ‘वार्ता’ और ‘सर्वभूतहित’ जैसी अवधारणाएँ बहुत कम की दिखाई देती हैं। यह अध्ययन कुछ चुने हुए संस्कृत ग्रंथों के मूल भाव को समझकर और उसे आज की नीति-समस्याओं से जोड़कर किया गया है। इसमें प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में निहित लोकहित, उत्तरदायित्व, समझदारी, न्याय और लोककल्याण जैसे विचारों को आज के लोकतांत्रिक ढांचे में के अनुसार तुलना करके उनकी प्रासंगिकता का विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

Key Words: भारतीय ज्ञान परंपरा, लोकनीति, नीति, लोकसंग्रह, प्रजाकल्याण, कौटिल्य, दण्डनीति, सुशासन, सार्वजनिक नीति इत्यादि।

Publication Details:

Journal : Sanvahak (संवाहक)

ISSN : 3108-1347 (Online)

Published In : Volume-2 | Issue-2, April-June, 2026

Page Number(s) : 86-91

Publisher Name :

 Mrs Anubha Chaudhary | https://sanvahak.gyanvividha.com | E-ISSN : 3108-1347

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